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Wednesday, December 21, 2011

आओ मनमौनी बाबा, आज तुम्हे थोडा अर्थशास्त्र पढाएं


कौन कहता है कि मनमोहन अर्थशास्त्री है? कौन उनके नाम के आगे "डॉ." की उपाधि लगाता है?
कौन है वह, ज़रा सामने तो आए?
समाज में इस तरह की अफवाहे फैलाने का दंड तो मिलना ही चाहिए|


मनमोहन का अर्थशास्त्र, अभी आपके सामने प्रस्तुत है| मैंने अर्थशास्त्र नहीं पढ़ा है| Economics का "E" भी नहीं जानता| किन्तु अपना हिसाब किताब तो खुद ही कर लेता हूँ| उसके अनुसार ही कुछ गुस्ताखी कर रहा हूँ|


मनमौनी ने अभी रूस यात्रा की| यात्रा का मुख्य कारण था रूस के साथ किया गया एक रक्षा समझौता| जिसके अंतर्गत 20 हज़ार करोड़ की लागत से मनमौनी ने रूस से 42 सुखोई विमान खरीदे हैं| अव्वल तो मुझे इसकी ज़रूरत ही नहीं लगती| मैंने अपनी पिछली पोस्ट में भी लिखा था कि जब भारत अग्नि, पृथ्वी, ब्रह्मोस, त्रिशूल जैसी अत्याधुनिक मिसाइलें बना सकता है तो ये टुच्चे-मुच्चे लड़ाकू विमान उसके लिए कौनसी बड़ी बात है? रक्षा मंत्रालय की ओर से पहले इस दिशा में एक कारण यह दिया गया था कि DRDO (Defense Research & Development Organisation) ने 22 साल की मेहनत से जो अपना खुदका लड़ाकू विमान तैयार किया था उसे भारतीय वायु सेना ने अयोग्य घोषित कर दिया| अत: भारत लड़ाकू विमान बनाने में असक्षम है इस बात को मानते हुए अमरीका, रूस, फ्रांस आदि देशों से भारत रक्षा समझौते कर रहा है|
यह माना जा सकता है कि वह विमान अयोग्य हो, आखिर DRDO का काम कैसे चलता है यह सब जानते हैं| किन्तु क्या यह बात मानने में आती है कि इतनी भारी भरकम मिसाइलें बनाने वाला देश लड़ाकू विमान तक नहीं बना सकता? जिस देश के पास डॉ. कलाम जैसे वैज्ञानिक हों, उनके लिए सुखोई, मिग जैसे विमान क्या हैं?


चलिए एक बार यह भी मान लिया कि सच में भारत देश इस काम के लिए नालायक है| इस कारण विदेशों से ये विमान खरीदने पड़ेंगे| और इसीलिए पहले रूस से 20 हज़ार करोड़ का समझौता हुआ और बाद में फ्रांस से 10 हज़ार करोड़| मतलब कुल 30 हज़ार करोड़|
हमे विदेशों से ये विमान खरीदने हैं, मगर कितने? क्या जितनों की ज़रूरत है उतने खरीदना ज़रूरी है? क्या एक-दो विमान खरीद कर उनकी नक़ल तैयार नहीं की जा सकती? मुझे नहीं लगता कि भारतीय वैज्ञानिक और इंजिनियर इतने नालायक हैं कि नकल भी न कर सकें|
यदि ऐसा किया होता तो 30 हज़ार करोड़ का काम फ़ोकट में हो जाता|


अब ज़रा एक नज़र अर्थशास्त्र पर -


यदि 42 सुखोई न खरीद कर वैसे ही किसी पुराने सुखोई की नक़ल तैयार की जाती तो कितना खर्च आता और उससे क्या-क्या लाभ होते?
इसके लिए मैंने 30 हज़ार करोड़ का एक प्रोजेक्ट बनाया| अब मेरे पास दो विकल्प थे
या तो एक करोड़ लोगों को लेकर 30 हज़ार करोड़ का निवेश किया जाता, जिसमे प्रत्येक के हिस्से में 30 हज़ार रुपये आते| किन्तु यह अधिक कारगर न लगा तो मैंने दूसरा विकल्प सोचा|
यदि 30 हज़ार लोगों को साथ लेकर 30 हज़ार करोड़ खर्च किये जाएं तो प्रत्येक के हिस्से में एक एक करोड़ का निवेश आता है| किसी एक अच्छे वैज्ञानिक को पांच-दस लाख रुपये देकर किसी विमान की नक़ल तैयार कराई जाती| मुझे नहीं लगता कि इस काम में इससे अधिक खर्च आता| बल्कि हमारे बड़े से बड़े वैज्ञानिक यह काम फ़ोकट में ही करने को तैयार हो जाएंगे| बस जो तकनीकी खर्चा आएगा, वह झेलना पड़ेगा|
नक़ल तैयार होने के बाद तो यह काम कुछ भी नहीं रह जाएगा| यकीन मानिए, छोटा-मोटा ही सही किन्तु मैं भी एक इंजिनियर ही हूँ| विमान के आकार-प्रकार और तकनीकी का पता चलने के बाद में उसकी डुप्लीकेट कॉपी बनाना अधिक कठिन नहीं होगा| क्योंकि अब बाकी तो केवल असेम्बलिंग का काम ही बचा न| फिर भी यदि मुझ पर विश्वास न हो तो किसी अच्छे Aeronautical Engineer से संपर्क किया जा सकता है| एक वैज्ञानिक के बाद बाकी बचे 29,999 लोगों में ऐसे केवल 999 Engineers जुगाड़ना भारत सरकार के लिए कोई बड़ी बात नहीं है| इन इंजीनियर्स में कुछ Aeronautical होंगे, कुछ Electronics, कुछ Mechanical, कुछ Electrical, कुछ Metallurgy बस|
चलिए वैज्ञानिक एक नहीं पांच चाहिए तो चार इंजीनियर्स कम किये जा सकते हैं| प्रोजेक्ट 30,000 लोगों से बाहर नहीं जाएगा|
99 बड़े व अनुभवी इंजीनियर्स को 50,000 रुपये मासिक वेतन पर रखा जाए| ध्यान रहे, यह कोई बड़ी बात नहीं है| प्रत्येक के खाते में एक करोड़ रुपये हैं| चूंकि कुल विमानों की संख्या 42 है, इस हिसाब से हमारे पास करीब सवा दो अनुभवी इंजिनियर प्रति विमान के हिसाब से होंगे| जो इन सबके लिए सुपरवाइज़री करेंगे|
करीब दो सौ मध्यम क्रम के इंजीनियर्स को करीब 30-35 हज़ार के मासिक वेतन पर रखा जा सकता है| इस श्रेणी के हमारे पास करीब पांच इंजिनियर प्रति विमान के हिसाब से होंगे जो विमानों के किन्ही मुख्य हिस्सों पर ध्यान देंगे|
फिर निम्न वर्ग के 700 नए इंजीनियर्स को करीब 25,000 रुपये के मासिक वेतन पर रखा जा सकता है| इनकी उपलब्धता हमारे पास करीब 17 इंजीनियर्स प्रति विमान होगी| जो विमान के एक, दो या तीन भागों का काम सम्भालेंगे|
इंजीनियर्स के बाद करीब 5000 या इससे अधिक Technicians को करीब 15,000 के मासिक वेतन पर रख करीब 120 या अधिक Technicians प्रति विमान पर काम लिया जा सकता है, जो विमान का बाकी तकनीकी काम संभाल सकते हैं|
सबसे अंत में करीब 23,000-24,000 हज़ार अन्य छोटे-मोटे कर्मचारियों को करीब 10,000 रुपये के मासिक वेतन पर रख लिया जाए, जिससे कि हमारे पास करीब 570 अन्य कर्मचारी प्रति विमान उपलब्ध हों|
कुछ लोगों को शंका हो सकती है कि यह काम आखिर कितने दिन चलेगा| मैं कहता हूँ कि पूरा जीवन चलता रहेगा| याद रहे, प्रत्येक व्यक्ति के खाते में एक करोड़ रुपये हैं| सबसे अधिक वेतन पाने वाले इंजीनियर्स को 50,000 मासिक मिल रहा है| इस हिसाब से वह करीब 16-17 वर्षों तक यह काम कर सकता है| ठीक है, जब वेतन बढाने की बारी आए तब भी कोई चिंता नहीं| 30 हज़ार करोड़ का ब्याज इतना होगा कि ये Money Rotation जीवन भर चलता रहेगा| ये इतना धन है कि विमान को बनाने के लिए लगने वाले Raw Materials का खर्चा भी निकल सकता है| शायद थोडा बहुत ऊपर से लगाना पड़ जाए| इसमें कोई बड़ी बात नहीं है| विदेशों में इतने रुपये फूंकने से यह कहीं बेहतर है| अमरीका, रूस, फ्रांस आदि देश इसे अपने खर्चे के हिसाब से मुनाफा कमा कर बेचते हैं| हमारा माल व मजदूरी उनसे कहीं अधिक सस्ते हैं| इन देशों में मिलने वाला माल व मजदूरी हम भारतीयों के लिए कम से कम दस गुना महंगे हैं|
शायद कुछ लोगों को इस प्रकार तैयार विमानों की गुणवत्ता पर शंका हो| कोई बात नहीं इस शंका को दूर करने के लिए दो उपाय किये जा सकते हैं| एक तो इस प्रोजेक्ट में किसी भी प्रकार के आरक्षण की कोई संभावना न रखी जाए, जिससे की बेहतरीन वैज्ञानिक व इंजीनियर्स यह काम सम्भालें न की भीख में नौकरी पाने वाले, आरक्षण के द्वारा गुणी लोगों का हक़ मारने वाली जमात| दूसरा उपाय, एक से डेढ़ लाख रूपये मासिक पाने वाले बीस-पचास अति अनुभवशाली इंजीनियर्स को और रखा जा सकता है| चिंता न कीजिये, धन बहुत है| इसकी कोई कमी भारत देश में नहीं है|


आंकड़ों में थोड़ी बहुत ऊंच-नीच हो सकती है, मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ| कोई अच्छा अर्थशास्त्री इसमें संशोधन कर सकता है|


अब बताइये कि 30,000 करोड़ के इस रक्षा समझौते में किसी को क्या फायदा हुआ? सारा फायदा विदेशों को और हमारे खाते में केवल नुकसान| यदि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री अपना थोडा सा अर्थशास्त्र उपयोग में ले सकें तो 30,000 लोगों को रोज़गार भी मिल जाएगा|


ध्यान रहे चीनी ऐसा कर चुके हैं| साल 2009 में इंधन ख़त्म होने की वजह से एक अमरीकी विमान को चीन में उतारना पडा था| आधिकारिक रूप से इस विमान को मुक्त करने में चीन ने दस दिन लगा दिए और इन दस दिनों में चीन ने इस विमान की पूरी जन्मकुंडली बनाकर वैसे पचासों विमान खड़े कर दिए|
जब चीन यह काम कर सकता है तो मात्र 400 करोड़ की लागत से "चंद्रयान" बनाने वाले दिग्गज भारतीयों के लिए यह कौन सी बड़ी बात है?
अभी तो 400 करोड़ में एक विमान खरीद रहे हैं, जबकि हम भारतीय 400 करोड़ में चंद्रयान जैसा उपगृह बना चुके हैं, जिसे देख अमरीकी आँखें भी फटी रह गयीं थीं|
मुझे तो लगता है कि भारत देश को एक अत्याधुनिक लड़ाकू विमान खडा करने में अधिक से अधिक चालीस-पचास करोड़ का खर्चा आएगा या शायद उससे भी कम|


और यही अर्थशास्त्र यदि अन्य दिशाओं में भी लगाया जाए तो भारत हर वो निर्माण करने में सक्षम है, जिसकी इस समय दुनिया को आवश्यकता है| हमे तो नक़ल करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है| भारत सब कुछ खुद करने में ही सक्षम है| फिर न हमे रक्षा समझौतों की ज़रूरत होगी, न वाल मार्ट की और न ही अन्य विदेशी समानों की जो हमारे घरों तक पर अपना कब्ज़ा जमा चुके हैं|
सोचिये ज़रा, यदि इन सब विदेशी वस्तुओं का भी बहिष्कार हम भारतीय कर दें तो अपनी अर्थव्यवस्था व निर्माण से कितने ही भारतीयों को अच्छा ख़ासा रोज़गार मिल सकता है|
जब केवल लड़ाकू विमान बनाने में ही 30,000 भारतीयों को काम मिल रहा है तो सभी क्षेत्रों में स्वावलंबी होने पर कितने ही भारतीयों को रोज़गार मिलेगा| शायद काम इतना बढ़ जाएगा कि लोग कम पड़ जाएंगे| भारत देश में कोई भी बेरोजगार नहीं होगा|

नोट : आज भी हम भारतीय यह मानते हैं कि 17 दिसंबर 1903 में राईट बंधुओं ने पहला विमान बना कर अमरीका के दक्षिण कैरोलीना के समुद्री तटों पर उड़ाया जो 120 फुट की ऊंचाई तक उड़ने के बाद नीचे गिर गया था| जबकि इससे आठ वर्ष पहले एक मराठी श्री शिवकर बापूजी तलपडे ने सन 1895 में मुंबई के चौपाटी के समुद्री तट पर एक विमान बना कर उड़ाया था जो 1400 फुट की ऊंचाई तक उड़ा और सुरक्षित नीचे उतार लिया गया| मज़े की बात इसमें कोई भी चालक नहीं था| इस महान वैज्ञानिक ने इसे ज़मीन से ही नियंत्रित कर उड़ाया था| उससे भी अधिक मज़े की बात यह है कि इसकी प्रेरणा उन्होंने महर्षि भारद्वाज के विमानशास्त्र से ली जो भारद्वाज मुनि कई हज़ार साल पहले लिख चुके हैं| बाद में अंग्रेजों ने झांसा देकर उनसे इस विमान का डिजाइन हथिया लिया| इस घटना के कुछ ही समय पश्चात श्री शिवकर बापूजी तलपडे की रहस्यमय तरीके से मौत हो गयी| किन्तु मैकॉले मानस पुत्र इस सच्चाई को आज तक हमारे पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं कर पाए| जबकि आज तक राईट बंधुओं का गुणगान गाए जा रहे हैं|

22 comments:

  1. आंकड़ों में ऊंच नीच हो सकती है ...पर ऐसे आंकड़ों का ओवरव्यू ही हकीकत दिखने को काफी है......

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  2. बढिया हिसाब! विमानशास्त्र की किताब है हमारे पास। इसलिए मालूम है कि कितना सही लग रहा है।

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  5. I m a junior design engineer of electronics, me apse shmt hun pr pura nhi becoz 1.hme 5 G vimano ki jrurat hai 2. hm in sb ke bavjud 3 G viman bna skte hai
    mere vichar me arjun mark-2 tank jo 37 crore ka hai vo 540 tank aa jate aur paise bhi desh me hi hote bhartiya sena ko itne tank de dene chahiye ki har 10 ve sainik ke pas 1 tank ho

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  6. .

    आपके अर्थशास्त्र विवेचन ने मंत्रमुग्ध कर दिया ! काश इतनी गहराई से श्री सिंह भी सोच सकते ! लेकिन वे क्यों सोचेंगे? जब सब-कुछ यूँ ही सुलभ हो बिना दिमाग का व्यय किये तो कोई क्यों चिंता करे ! देश की अर्थव्यवस्था संभले अथवा चरमराये , उनका क्या बिगड़ता है! भुगतने के लिए एक अरब जनता जो है !

    प्रधान मंत्री को अपने देश के काबिल इंजीनियर्स पर शायद ज़रा भी भरोसा नहीं है , तभी तो २० हज़ार करोड़ की लागत के ४२ सुखोई विमान रूस से खरीदे ! क्या पता इसमें से लितने करोड़ उनके विदेशी खाते में जाना तय हुआ होगा! यदि अपने वैज्ञानिक एवं अभियंता इतने ही नालायक है तो हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था को बदलने का प्रयास करना चाहिए ! इतनी बड़ी धनराशी देश के बाहर जाए तो दाल में काला ही नज़र आता है ! क्या हमारे पास इस निर्णय का अन्य कोई विकल्प नहीं ? या फिर श्री सिंह का अर्थशास्त्र कुछ ज्यादा ही महान है ! २० हज़ार करोड़ देकर भी अपने धार्मिक ग्रन्थ के अपमान पर चुप रहे ?

    .

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  7. aapka arthshastr vivechan sarahniye hai.aapne sahi kaha jis desh ke paas abdul kalaam jaisa vegyanik hai itne saamarthya ingineers hain unhe baahar se khreedne ki kya jaroorat.agar aapne kalaam ji ki book padhi ho to aapko yaad hoga apj kalaam ji ne dubara raashrpati chunaav ke liye mana kar diya tha infact pahle hi baahar jaana chahte the koi to karan hoga?spasht hai ye log yadi yeh business nahi karenge to inki tijoriyan kaise bharengi.

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  8. दिवस भाई बहुत ही शसक्त प्रस्तुति..शायद देश के तथाकथित नेताओं को दलाली की हड्डी खाने की आदत पड़ चुकी है..
    अभी एक बंधू ने कहा की हमे 5 G विमानों की की जरत है..शायद BORANA जी आप तथ्य देखें कभी भी किसी देश ने अपनी आधुनिकतम तकनीकी नहीं दी है...
    दिवस भाई ये बात हमें स्वीकार करनी पड़ेगी की तकनीकी के मामले में हम पिछड़े हैं इसलिए नहीं की प्रतिभा नहीं है बल्कि इसलिए की उसका इस्तेमाल यूरोप के लिए होता है....

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  9. दिवस भाई,पैसा है तो खरीद ले रहे हैं, लेकिन शक्तिशाली भारत का निर्माण दूस‌रे के हथियारों से नही हो सकता.हमें अप‌ने हथियार खुद बनाने होंगे. हाँ भारतीय इंजीनियरों की अमेरिका परस्ती बदलने की जरूरत है....

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  10. दिवस जी आपके आलेख को संसद के पटल पर होना चाहिये।
    हमारे देश में प्रतिभा एवं धन की बहुतायत है, किन्तु हमें सही
    ढ़ंग से दोहन करना नहीं आता। हमारे इंजिनियरों का सही इस्तेमाल
    अमेरिका तथा दुरुपयोग भष्ट नेता कर रहें हैं और हम केवल अपनी
    टिप्पणियां देना ही अपना कर्तव्य समझ लेते हैं।
    प्रेरित एवं जागृत करने वाली रचना।

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  11. आपके जैसे तांत्रिक लोगो की हमारे भारत को नितांत जरूरत है। आपका येवम भारत देश का शुभचिंतक भूपेंद्र >>>>>>>>>>>>>

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  12. Me to yahi kahna chahunga ki Astrashastra lene ke sabandh me jobhi nirnay liye jaye us me kisi bhi parti ya kisi bhi pad par bethe neta ka us me koi hastshep nahi hona chahiye is ka nirnay sena ke adhikariyo ko hi lena chahiye na ki netao ko

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  13. Desh K Sabhi M.P.o Ko Is Par Dyan Dena Chahiy

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  14. हमारे गोल्ड मेडलिस्ट अर्थशास्त्री माननीय मन्नू जी को देश के आर्थिक मामले में आप जैसे लोगो के सलाह की भरपूर जरुरत है . ..मन्नू जी के अर्थशास्त्र पर तो सवालिया निशान लगा हुआ है ही पर अब तो सामान्य ज्ञान पर भी संदेह होता है.

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  15. wah g wah aap jaise hi economist to chahiye bharat ko jinki kami bhi nahi hai bas, talash hai ek sahi mauke ki or sahi paarkhi ki..

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  16. बहुत खूब जी
    शायद मनमोहनसिंह भी इस को पढ़ लेता

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  17. बहुत खूब जी
    शायद मनमोहनसिंह भी इस को पढ़ लेता

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  18. शायद मनमोहनसिंह भी इसे पढ़ ले वे
    पर बेचारा सोनिया के पास बैठा होगा

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  19. राष्ट्रिय धन के दुरूपयोग की पराकाष्ट,सार्थक और गहन अर्थशास्त्रीय विश्लेषण ,ज्ञान का राष्ट्रिय चिंतन में सदुपयोग,जनसाधारण के लिए आँख खोलने वाले विश्लेषण

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