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Sunday, May 13, 2012

शायद एक अभिनेता, न्यायलय व देश की जनता से भी अधिक विश्वसनीय है।

एक थोड़ी पुरानी खबर पर ध्यान गया। अभी कुछ समय पहले कोल्हापुर (महाराष्ट्र) के जिला कलेक्टर ने कन्या भ्रूण हत्या जैसी त्रासदी से निपटने के लिए एक बेहतरीन सुझाव रखा। इन्होने कहा था कि हमे एक ऐसा तन्त्र बनाना चाहिए जिसमे प्रत्येक गर्भवती की समस्त जानकारियाँ व तस्वीरें ऑनलाइन एकत्र हों। उन्होंने "Silent Observer" नामक एक device की बात रखी जो एक software पर काम करती है। इसमें अपनी खुद की memory भी होगी। जिसके अंतर्गत किसी भी प्रसूता की समस्त जानकारियाँ व गर्भ के चित्र store हो सकते हैं। यह सब इसलिए ज़रूरी है ताकि कोई भी डॉक्टर Pre-Conception व Pre-Natal Diagnostic Techniques (Prohibition of Sex Selection) Act, 1994 के अंतर्गत कोई भी गलत रिपोर्ट न बना सके व इसके द्वारा कन्या भ्रूण हत्या को रोका जा सके।
हालांकि इसके विरुद्ध Maharashtra chapter of the Indian Radiological and Imaging Association के एक चिकित्सक डॉ. जिगनेश ठक्कर ने एक petition दायर की थी। डॉ. ठक्कर के अनुसार इस प्रकार की जानकारियाँ कोई तीसरा व्यक्ति भी देख सकता है। इससे किसी भी स्त्री की निजता को खतरा है। परन्तु महाराष्ट्र उच्च न्यायलय के चीफ जस्टिस मोहित शाह व जस्टिस आर पी सोंदुरबलदोता ने डॉ. ठक्कर की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट का कहना था कि न्यायालय लड़का-लड़की के बिगड़ते अनुपात पर आँख नहीं मूँद सकता।
खैर केस चला, जीता भी गया, सरकार के पाले में गेंद गयी, फिर क्या हुआ, पता नहीं चला।

1 जनवरी 2008 को दिल्ली में मेडिकल के छात्रों ने भ्रूण परिक्षण करने व कन्या भ्रूण को गिरा देने के विरुद्ध एक आन्दोलन किया था। जिसमे दिल्ली के बड़े-बड़े नामी-गिरामी डॉक्टर भी शामिल थे।

22 फरवरी 2010 को आगरा शहर के हज़ारों छात्रों ने कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध एक जागरूकता अभियान चलाया।

मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने भी प्रदेश में बेटी बचाओ अभियान को जोर-शोर से चलाया।

  23 नवम्बर 2011 को बंगलुरु शहर में कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध एक मेराथन का आयोजन किया गया जिसमे हज़ारों नगरवासियों ने भाग लिया।

10 सितम्बर 2003 को Centre for Enquiry Into Health And Allied Themes (CEHAT) ने भी civil 301, 2000 के तहत जस्टिस एम् बी शाह व जस्टिस अशोक भान की बेंच में एक petition दायर की थी। जिसमे Union of  India (UOI) को जवाब देना था। यह फैसला CEHAT के पक्ष में हुआ था।

13 जून 2005 को मुंबई उच्च न्यायलय में Criminal Writ Petition No. 945 of 2005 and Criminal Application No. 3647 of 2005 के अंतर्गत विनोद सोनी नामक एक व्यक्ति ने जस्टिस वी डी पालशिकर व जस्टिस वी सी डागा की अगुवाई में petition दायर की, जिसमे भी फैसला विनोद सोनी के हक़ में हुआ।

ऐसे पता नहीं कितने ही किस्से कन्या भ्रूण हत्या के इतिहास में जुड़े हुए हैं। पता नहीं कौन इन पर काम करता है? कोई याद भी रखता है या नहीं? जब न्यायलय की बात ही नहीं मानी जाती तो देश की जनता की कौन सुने?

परन्तु पता नहीं अभी ऐसा क्या हो गया कि अचानक सारे देश का ध्यान कन्या भ्रूण हत्या पर खिसक गया? फिल्म अभिनेता आमिर खान ने एक शो क्या बना दिया जैसे देश की काय पलट ही कर दी। यहाँ तक कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व राजस्थान उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस अरुण मिश्र ने भी अब कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ मुहीम छेड़ दी। गहलोत ने चीफ जस्टिस से गुहार लगाईं है कि वे जल्दी ही ऐसे सभी मामलों को एक ही कोर्ट में लेकर आएं ताकि शीघ्रता से इन पर सुनवाई हो सके। शनिवार की प्रभात आमिर खान ने भी अशोक गहलोत की खुले दिल से प्रशंसा कर दी।

मतलब हम क्या बेवकूफ थे जो इतने सालों से इस विषय पर चिल्ला रहे थे?  देश का न्याय तंत्र भी इतना लाचार कि कोई उसकी सुनता ही नहीं। एक आमिर खान ही दूध का धुला है। उसने यदि सर्टिफाइड कर दिया तो कुछ मामला बने। अन्यथा अपना काम नहीं बनता, भाड़ में जाए जनता।

आमिर खान ने चाहे एक पब्लिसिटी स्टंट ही क्यों न मारा हो, यदि उसका इतना असर है तो क्या उसे ही Chief Justice of Supreme Court नहीं बना देना चाहिए? भई जब सारे प्रमाण पत्र उसे ही बांटने हैं तो सीधा काम उसे ही क्यों न सौंप दिया जाए? देश में न्याय व्यवस्था की आवश्यकता ही क्या है?

Thursday, April 19, 2012

देश के शत्रुओं पर छा रहा है दिव्या का खौफ...

हिंदी ब्लॉग जगत में अब तक जिस काम से दूर रहा, आज वही काम करने में बड़ा मज़ा आ रहा है। कोरे राष्ट्रवाद पर पोस्ट लिख देने भर से क्या होता है, जब राष्ट्रवादियों पर आक्रमण हो तो कौन होगा उनके साथ? सभी तो पोस्ट लिखने में बिजी हैं।  
कल ही डॉ. दिव्या श्रीवास्तव के ब्लॉग पर एक पोस्ट (कुमार राधारमण नामक ब्लॉगर पर 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का भूत) देखी। दरअसल उनकी एक पिछली पोस्ट (गौ-हत्या) से बौखलाकर हिंदी ब्लॉग जगत के सबसे निकृष्ट व इस्लाम के पैरोकार कहे जाने वाले ब्लॉगर अनवर जमाल ने उनके खिलाफ अपनी "इस्लामी टट्टी" पेल दी। गौ-हत्या नामक पोस्ट में केवल एक पंक्ति लिखी गयी जिसमे दिव्या जी का कहना था कि "गौ-हत्या करने वालों को गला रेंत कर मार डालना चाहिए। ताकि अगले जन्म में ये अल्लाह के नेक बन्दे बन सकें।"
इस पर भड़क कर जमाल ने अपनी आदतानुसार अपनी ब्लॉगरीय गुंडई झाड़ते हुए उन्हें थाईलैंड में गौ-हत्या के विरुद्ध आन्दोलन चलाने की सलाह दे डाली। दिव्या के नाम पर उल्टियां पेलती पोस्टें तो ब्लॉग जगत में बहुत देखी हैं। अब टीआरपी के लिए स्साला कुछ तो करेगा। भई दिव्या श्रीवास्तव के नाम का खौफ ही इतना है।
जमाल की पोस्ट पर इस्लामी भौंक गूँज रही थी। दिव्या जी को दुनिया भर की नसीहतें दी जा रही थीं। एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा था कि जैसे शान्ति के सबसे बड़े पुजारी यही लोग हैं। फिर इतिहास में पिछले 1300 वर्षों में क्या हुआ उस पर इनके द्वारा आँखें मूँद ली जाती हैं।
इसी भौंक के बीच में कुमार राधारमण नामक नपुंसक प्रजाति का भी अवतरण हुआ। इन्हें दिव्या के नाम से इतना खौफ व ईर्ष्या है कि इन्हें कटती हुई गायें भी नैतिकता की श्रेणी में दिखाई दे रही हैं। जनाब का कहना है कि "दिव्याजी ने हिन्दी ब्लोगिंग में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। किन्तु कुछ समय की उनकी दो-चार पोस्टें निश्चय ही निंदनीय हैं।"
मतलब गौ-हत्या के विरुद्ध आवाज़ उठाना इन महाशय को इसलिए निंदनीय लग रहा है क्योंकि इनके लिए दिव्या जी निंदनीय है। भारत जाए भाड़ में, गौ माता जाए जाए भाड़ में, हिन्दू धर्म जाए भाड़ में, पहले इनका अहम् सिद्ध होना जरुरी है।
अगली ही पंक्ति में महाशय जी भौंक रहे हैं कि "इन्हें देखकर यह यकीन करना मुश्किल होता है कि हम उन्ही दिव्या जी को पढ़ रहे हैं जिनकी पोस्टें कभी गहन बौद्धिक विचार विमर्श का केंद्र हुआ करती थीं।"
महाशय मैंने तो आपको कभी किसी "गहन बौद्धिक विचार विमर्श" में शामिल होते नहीं देखा। क्या आपके पास बुद्धि का अकाल है? तुम्हारी खुद की दो कौड़ी की औकात और तुम चले हो दूसरों को सर्टिफिकेट बांटने???

जमाल की इस घटिया पोस्ट पर हमने भी अपनी एक टिप्पणी चिपका डाली जिसे इसने गुंडागर्दी से मॉडरेट कर दिया। मेरी टिप्पणी-
निकाल दी ना अपनी इस्लामी टट्टी। आ गए ना उसी ढर्रे पर। दिव्या के नाम पर टी आर पी कमाना तो तुम्हारी पुरानी आदत है। इतना खौफ उनके नाम का कि कटती हुई गाय भी जायज़ लग रही है? उन्होंने तो अपनी पोस्ट में कहीं भी किसी देश का नाम नहीं लिखा, फिर तुमने कैसे उन्हें थाईलैंड में आन्दोलन चलाने की नसीहत दे दी? उन्होंने साफ़-साफ़ लिखा है कि गौहत्या करने वालों का गला रेंत कर मार डालना चाहिए। फिर चाहे वह हत्यारा भारत का हो, अफगानिस्तान का अथवा थाईलैंड का। तुम अपनी बवासीर पेलना बंद करो।
यहाँ पर मुसलमानों की हत्या की बात नहीं हुई। किन्तु जो मुसलमान खुद को गौरी-गजनी की औलाद मानता है वह इस देश में जीने का अधिकारी नहीं है। तुम्हारा क्या सोचना है? तुम्हारे पूर्वज कौन थे? भारतीय मुसलमानों की डी एन ए रिपोर्ट तो यही कहती है कि इनके पूर्वज हिन्दू थे। इस्लामी आतताइयों के अत्याचारों से त्रस्त होकर ही तुम्हारे बाप-दादाओं ने इस्लाम अपनाया था। शान्ति का पाठ तुम ना पढाओ तो ही बेहतर है। सारे विश्व में अशांति फैलाने वाली ज़मात को शान्ति शब्द शोभा नहीं देता। बारहवीं शताब्दी तक भारत की कुल आबादी साठ करोड़ थी किन्तु सत्रहवीं शताब्दी थ आते-आते भारत की आबादी मात्र बीस करोड़ रह गयी, उसमे भी कई तो मुसलमान थे। मतलब पांच सौ वर्षों में जिस जमात ने करीब पचास करोड़ हिन्दुओं के रक्त से अपने दीन को स्थापित करने की कुचेष्टा की वह आज शान्ति का पाठ पढ़ा रही है।
राधारमण जैसे लोग तो टट्टुओं की श्रेणी में आते हैं। जो कि मिली-जुली प्रजातियों की पैदाइश होते हैं। इन्हें अपने सर और पैर का ही पता नहीं। बस दिव्या जी के नाम से आतंकित होलर मन में ईर्ष्या व द्वेष पाल बैठे हैं। इसका अहम् इतना आड़े आता है कि इन्हें अपने अहम् के आगे गौवध में नैतिक लग रहा है। राधारमण, तुम जैसे नपुंसक पुरुषों से कहीं ज्यादा मर्दानगी दिव्या श्रीवास्तव नामक महिला में है। तुम्हारे अलावा तो यहाँ केवल इस्लामी भौंक ही अधिक सुनाई पड़ रही है। अब सोच लो तुम किस प्रजाति में शामिल हो? 



मतलब जब-तक मिले सुर मेरा तुम्हारा तब सुर बने केवल तुम्हारा। जैसे ही कोई अपना सुर उठा ले तो पूरा सुर ही बिगड़ गया तुम्हारा। केवल भौंकने वालों को वहाँ स्थान दिया जाता है क्या? कुंवर जी  नामक ब्लॉगर ने भी जब तुम्हारा सुर बिगाड़ा तो उनका भी गला घोंट दिया? बदले में एक मेल मेरे इनबॉक्स में डाल दी जिसमे भी मुझे ही तमीज का पाठ पढाया? मतलब तुम चाहे हमारी माँ को काटो, इसका विरोध करने पर हमारी बहन का अपमान करो, फिर भी तुम पाक साफ़ और हम बदतमीज़?
हथियारों की हिंसा तुम करो और हमारी जुबानी हिंसा भी नहीं झिलती तुमसे?
इनबॉक्स में क्या रो रहा है, दम है तो मेरी टिप्पणी पब्लिश कर। ताकि सबके सामने बात हो। इनबॉक्स में गुप-चुप क्या भौंक रहा है? चोर की दाढ़ी में तिनका...
ऐयाज अहमद ने भी इस विषय में खट्टी डकारों के साथ अपनी बवासीर छोड़ी है। वहाँ से भी मेरी टिप्पणी को हटा दिया गया। भई इस्लाम खतरे में जो है इनका। एक अकेली दिव्या भारी पड़ गयी इन्हें।

कुंवर जी ने भी इस गुंडागर्दी पर अपनी राय व्यक्त की है, यहाँ देखें। उनका विशेष आभार।

पुरुषों की खाल में छिपे किन्नरों को यह जान लेना बहुत ज़रूरी है कि उनसे कही अधिक मर्दानगी दिव्या श्रीवास्तव में भरी पडी है। स्त्री होकर भी वह दम जो किसी के पचाए नहीं पचता। उन्होंने तो अपने ब्लॉग पर टिप्पणी विकल्प भी बंद कर दिया। उन्हें किसी के समर्थन व विरोध की भी कोई चिंता नहीं। बस निस्वार्थ रूप से अपने विचार लिखती जा रही हैं। जिसे लाभान्वित होना है, होता रहे, जिसे कुढना है वो मरे।
है किसी में दम लड़ने का???

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नोट- कृपया कोई मुझे यहाँ तमीज का पाठ न पढाए, अन्यथा मैं इससे भी अधिक बदतमीज़ हूँ। तमीज में फंसे रह जाएंगे और शत्रु हमारी मातृभूमि , संस्कृति, देश, हमारी माँ-बहन सबको बर्बाद कर देंगे।

Thursday, February 23, 2012

सुप्रीम कोर्ट इससे अधिक कर भी क्या सकता था???

4 जून 2011 की अर्धरात्रि को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई रावणलीला पर आज सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है। शुक्र है 8 महीने ही लगे। अपने 20 मिनट के फैसले में सुप्रीम कोर्ट 19 मिनट तक दिल्ली पुलिस को लताड़ पिलाती रही और अंतिम एक मिनट बाबा रामदेव के नाम पर इतना कहा कि धारा 144 लगने के बाद उन्हें मैदान खाली कर देना चाहिए था जो कि नहीं हुआ। अत: उनकी भी ज़िम्मेदारी बनती है।
परन्तु मीडिया की माने तो दिल्ली पुलिस और बाबा रामदेव बराबर के ज़िम्मेदार हैं। बल्कि बार-बार पहला दोष बाबा रामदेव के मत्थे फोड़ने की कोशिश होती रही। आज शाम की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी बार-बार मीडियाई मुर्गे रामजेठमलानी जी से यही सवाल पूछ रहे थे कि राजबाला की मृत्यु पर मुआवज़े के पांच लाख में से सवा लाख बाबा रामदेव को भरने हैं, इस पर आपका क्या कहना है/ रामजेठमलानी का दो टूक जवाब इनके कलेजे चीर गया। उनका कहना था कि हमे तो ख़ुशी होगी जो हम राजबाला के परिवार की कुछ भी मदद कर सके। बल्कि उनकी बहु स्वयं यहाँ उपस्थित हैं। सवा लाख क्या, हम पूरे पांच लाख दे सकते हैं। लेकिन ये सवाल उनसे पूछो जिन्हें बाकी के पौने चार लाख भरने हैं।
खैर मीडिया से और कोई उम्मीद भी नहीं है। अभी तो बात करते हैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले की।
क़ानून(?) की बेड़ियों में फंसा न्यायालय इससे अधिक कुछ कर भी नहीं सकता था। क़ानून के अनुसार उसका निर्णय बिलकुल सही है किन्तु न्याय के अनुसार यह न्याय नहीं है।
दिल्ली पुलिस पर क्या आरोप मढना, यह सब तो पहले कहा ही जा चूका है। अभी देखें बाबा रामदेव का क्या दोष था?
सुप्रीम कोर्ट की एक ही आपत्ति है कि धारा 144 लागू होने के बाद बाबा रामदेव ने अपने समर्थकों से मैदान खाली क्यों नहीं करवाया? यह सब बातें इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि 4 जून के उस आन्दोलन में पुलिसिया लाठियों का शिकार होने के बाद मेरे सामने बहुत से "बुद्धुजिवियों" ने वही प्रश्न खड़े किये थे जो आज सुप्रीम कोर्ट ने किये हैं। यदि कानूनी चश्मा पहन कर देखा जाए तो बाबा रामदेव दोषी हैं। अरे भाई धारा 144 का उलंघन करने वाला दोषी नहीं होगा क्या?
लेकिन कौनसा क़ानून कब लागू करना है, कौनसी धारा कब किसके मत्थे मढ़नी है, इसका कोई ज़िक्र शायद हमारे संविधान में नहीं है। संविधान की इसी कमजोरी का फायदा कांग्रेस सरकार ने उठाया और आधीरात को धारा 144 दिल्ली में लागू की गयी। अब तो गयी भैंस पानी में। बाबा रामदेव के लिए तो इधर कुआं, उधर खाई थी। एक तरफ करीब एक लाख राष्ट्रवादी थे जो देश के लिए मर मिटने को तत्पर थे, वहीँ दूसरी ओर स्साली 144 धारा। जाएं तो कहाँ जाएं? भारत के हर कोने से लोग वहाँ जमा थे। कोई कश्मीर से तो कोई नागालैंड से, कोई कन्याकुमारी से तो कोई गुजरात व राजस्थान के रेगिस्तान से। दिल्ली में किसी का कोई ठिकाना नहीं था। आसरे के नाम पर केवल रामलीला मैदान का वह पंडाल जहां उस रात हम देश बदल देने का सपना देखते हुए उम्मीद की एक नींद सो रहे थे। ऐसे में धारा 144 हम जैसों के लिए काल बनकर आई थी। आधी रात, अनजान शहर, कहाँ जाएं? हम तो फिर भी 144 का पालन करने के लिए यहाँ-वहाँ सड़कों पर रात गुज़ार लेंगे, किन्तु उनका क्या, जो महिलाओं व बच्चों के साथ आए थे? दो व्यक्तियों के अलावा तीसरा व्यक्ति साथ में नहीं दिखना चाहिए था, वरना वहीं लाठियां। ऐसे में बाबा रामदेव क्या करते? हाँ उन्होंने क़ानून तोडा, तो क्या गलत किया? इस देश का संविधान लकीर की फकीरी करता है। सोचने-विचारने का काम यहाँ गैर कानूनी है।
हम तो आस लगाए बैठे थे कि चलो आठ महीने बाद आज न्याय मिलेगा। माना सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को दोषी मान लिया, लेकिन इस निर्णय ने किसी का क्या उखाड़ लिया? दिल्ली पुलिस क्या अपनी मर्ज़ी से वहाँ कोलावेरी डी मचाने पहुँच गयी थी? उनके आकाओं का क्या हुआ इस न्याय (आय एम् सॉरी, फैसले) में? उस रात ठुकने-पिटने वाले तो दर्द झेल गए इस आस में कभी तो न्याय मिलेगा। माँ राजबाला वीरगति पा गयीं, स्वर्ग से उनकी आत्मा न्याय पर नज़र लगाए बैठी होगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में जो भी दोषी साबित हुआ, उसके लिए सज़ा क्या है? क्या केवल दोषी की गाली दे देने से ही न्याय हो जाता है? क्या केवल 75% मुआवजा भरने के हुक्म से ही न्याय मिल जाता है?
क्या कार्यवाही होगी उन पुलिस वालों पर जो उस रात बर्बरता से हमे पीट रहे थे, और जिनके कारण माँ राजबाल आज हमारे बीच नहीं रही? क्या सज़ा होगी पुलिस के उन आकाओं की, जिनके इशारे पर पुलिसिया गुंडे वहाँ लाठी-बंदूकों के साथ हाज़िर हो गए थे? सबसे बड़ी बात क्या सज़ा होंगी कांग्रेस के उन नेताओं (विशेषकर गांधियों) की जिनका कालाधन विदेशों में जमा है, जिसे लाने के लिए हम पिट रहे थे?
इतना सस्ता न्याय नहीं चाहिए। हमने कीमत चुकाई है, हमे हिसाब बराबर चाहिए।

Monday, December 26, 2011

चीनी मकडजाल, अब बल व तकनीक के साथ-साथ टेलीकॉम का भी इस्तेमाल



सभी दिशाओं से भारत को घेरने के मंसूबे पालने वाला चीन अपनी गतिविधियों में सफल होता दिखाई दे रहा है| उत्तर पूर्वी व पूर्वी क्षेत्र पहले ही आतंक में है| बंगाल की खाड़ी में भी चीन अपना कब्ज़ा जमा चूका है| कश्मीर मामले में पाकिस्तान के साथ हाथ मिलाने वाला चीन हर क्षेत्र में पाकिस्तान की मदद के लिए तत्पर दिखाई दे रहा है| चीन पहले ही पाकिस्तान को मिसाइल टेक्नोलॉजी, नाभिकीय प्रौद्योगिकी, लड़ाकू विमान व अन्य उन्नत अस्त्र बाँट चूका है| भारतीय सीमाओं पर चीन का दबाव बढ़ता जा रहा है| अपनी सीमा चौकियों को भी चीन धीरे धीरे भारतीय सीमा के समीप ला रहा है| साथ ही चीनी घुसपैठ के किस्से भी आसानी से सुने जा सकते हैं| कुछ समय पहले तो हमारी सीमाओं में घुसकर चीनी सैनिकों ने पहाड़ों व चट्टानों पर चीन लिख डाला था|
खैर हमारे बेचारे प्रधानमंत्री शायद अभी तक इन सब बातों से अनजान हैं| तभी को अस्थाई शान्ति को बनाए रखने के भ्रम में बड़ी संख्या में सड़क परियोजनाएं, बाँध निर्माण परियोजनाएं, पॉवर प्लांट स्थापना, टेलीकॉम एक्सचेंज जैसे अधिकाँश काम केवल चीनी कम्पनियों को दिए आ रहे हैं|
भारत के भीतर सभी संवेदनशील स्थानों पर अपनी पकड़ बनाए रहने के लिए चीनी कम्पनियां औने-पौने दामों पर सभी प्रकार की परियोजनाए हथिया रही हैं| पूर्व राष्ट्रीय सलाहकार ने तो बहुत सी ऐसी परियोजनाओं की ओर इशारा भी किया था जो किसी न किसी संवेदनशील क्षेत्र से जुडी हैं और चीनी कम्पनियों ने अति अल्प लागत में टेंडर भरे| वहीँ दूसरी ओर बहुत सी ऐसी परियोजनाएं जिन्हें पूरा करने में चीन दक्ष है व साथ ही इस काम में चीनी कम्पनियां भारी मुनाफा भी कमा सकती थीं, किन्तु वहां चीन ने कोई टेंडर नहीं भरा जहाँ हमारा कोई संवेदनशील प्रतिष्ठान नहीं है|
उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में वेतरना बाँध का टेंडर बहुत सस्ती दर पर इसलिए भरा क्योंकि वहाँ समीप ही हमारा मिग लड़ाकू विमान असेम्बली केंद्र है, भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर है व देवलाली का तोपखाना (अर्टिलीयरी सेंटर) भी है| इसी प्रकार कावेरी-गोदावरी बेसिन में सीज्मिक सर्वे का टेंडर उसने इतनी सस्ती दर पर इसलिए भरा ताकि वह वहाँ के हमारे नौसैनिक प्रतिष्ठानों पर निगरानी रख सके|
तकनीकी रूप से तो चीन ने पूरे भारत में अपनी पकड़ बना ही ली है| दैनिक जीवन में काम आने वाली चीज़ों पर भी अब चीनी कम्पनियों ने अपना अधिपत्य जमा लिया है| चीन को पता चलना चाहिए कि भारत में पतंग उड़ाई जाती है तो बस चीनी पतंग व मांजा बाज़ार में उपलब्ध है| यहाँ होली-दीवाली मनाई जाती है तो अगले त्यौहार पर चीनी पटाखे, मोमबत्तियां, बिजली के बल्ब व होली के रंग व पिचकारी बाज़ार में आसानी से सस्ते दामों पर मिल जाएंगे| यहाँ तक कि एम् आर ऍफ़ जैसी कम्पनियों ने भी यह कहकर घुटने टेक दिए कि चीनी कम्पनियां हमसे कहीं अधिक सस्ती दर पर टायर बना कर भारतीय बाज़ारों में बेच रही हैं, अत: हम भी अपनी फैक्ट्रियां अब भारत से निकाल कर चीन में स्थापित कर रहे हैं|
अपने पिछले कार्यकाल के अंतिम दिनों में मनमोहन सिंह के अरुणाचल दौरे के समय चीन ने रात दो बजे चीन में भारतीय महिला राजदूत को जगाकर यह धमकी दी कि अपने प्रधानमन्त्री से कहो कि "वह तवांग जिले में न जाएं|"
तवांग एक बहुत ही संवेदनशील क्षेत्र है| इसके एक तरफ भूटान की सीमा लगती है तो दूसरी ओर तिब्बत की| तवांग एक प्रतिष्ठित बौद्ध केंद्र है| तिब्बत पर अपने नियंत्रण को सुदृढ़ करने के लिए चीन इसे हथियाना चाहता है| वरना क्या वजह थी कि हमारी राजदूत को रात दो बजे उठाकर यह धमकी देने की कि हमारे देश का ही प्रधानमन्त्री हमारे देश के किसी जिले में न जाए| सबसे बड़ी बात तो यह कि मनमोहन ने भीगी बिल्ली की तरह डरकर तवांग जाने का अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया|
इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी भारत सरकार चीन कि ओर से निश्चिन्त हो आँख मूँद कर सो रही है| जब जागती है तो कभी बाबा रामदेव को चोर साबित करती है तो कभी अन्ना को भ्रष्टाचारी| अब तो उन्हें भगोड़ा भी कह डाला| यदि कोई सरकार की नींद में खलल डाले तो उसे आधी रात में पीट-पीट कर दिल्ली शहर से खदेड़ दिया जाता है|
जिस देश ने हमे खत्म करने के मंसूबे पाल रखे हैं, हमारी सरकार आँख मूँद कर अपनी सारी व्यापारिक सुविधाएं उसे ही देते चली जा रही है| रिलायंस का पावर प्लांट हो या बीएसएनएल अथवा एयरटेल का टेलीफोन एक्सचेंज, सब चीन के हाथ में है| भारत के 35 प्रतिशत से अधिक पावर प्लांट व टेलीफोन एक्सचेंज चीनी ही लगा रहे हैं| इस प्रकार तो चीन हमारे देश में किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की फोन पर होने वाली बातें सुन सकता है| यहाँ तक कि उसे टेप भी कर सकता है| यह एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है| हमारे देश में टेलीकॉम के क्षेत्र में फैलता चीनी मकडजाल हमारे लिए एक गंभीर मुद्दा है| इसके परिणाम भयंकर हो सकते हैं| इसका कारण यह है कि हमने जो सी-डॉट के स्वीचिंग सिस्टम या टेलीफोन एक्सचेंज बनाए थे, वे अब बेकार हो गये हैं| क्योंकि यह टेलीकॉम की प्रथम जनरेशन थी जो अब पुरानी हो चुकी है| इसके बाद न तो हमने द्वितीय जनरेशन (2G) को विकसित किया है और न ही तृतीय जनरेशन (3G) को| ये सारे प्रोजेक्ट हमने आँख बंद कर चीन को सौंप दिए| हम 2G व 3G का ABC भी नहीं जानते वहीँ चीन ने 4G शुरू कर दिया| आश्चर्य तब हुआ जब भारत में 3G की विफलता के बाद भी चीन 4G लौंच करना चाहता है| किन्तु शर्म की बात ये हैं कि भारत सरकार ने चीनी कम्पनियों को यह सुविधा दे दी|
प्रारम्भ में मुझे यह कोरी अफवाह ही लगी थी क्योंकि मैं भी टेलीकॉम में काम कर रहा इंजिनियर हूँ और मेरा कार्य क्षेत्र 3G ही हैं| मुझे नहीं लगता था कि इस समय भारत में 4G की कोई गुंजाइश है| कोई भी कम्पनी इस प्रोजेक्ट में अपने हाथ नहीं जलाना चाहेगी| किन्तु उस समय बहुत आश्चर्य हुआ जब कुछ दिनों पहले मेरे ही एक मित्र को गुडगाँव में रिलायंस 4G के प्रोजेक्ट पर नौकरी मिली, जिसे एक चीनी कंपनी ही चला रही है| जब मैंने उससे पूछा कि यह कैसे सम्भव है? अभी तक तो भारत में पूरी तरह से 3G का काम भी नहीं हुआ, ऐसे में 4G कैसे लौंच किया जा सकता है? इस पर आश्चर्य तो उसे भी था किन्तु सबकुछ सामने ही घट रहा था|
क्या कारण है की 3G में घाटा खाने के बाद भी चीनी कम्पनियां 4G के पीछे पडी हैं| इस काम में निश्चित रूप से उन्हें भारी नुकसान होने वाला है| इससे यह साफ़ है कि ज़रूर चीनी सरकार इस काम के लिए चीनी कम्पनियों को मदद कर रही है| क्या हमारी सरकारों को इतनी सी बात पल्ले नहीं पड़ रही? क्या उन्हें किसी भी चीनी षड्यंत्र की गंध आनी बंद हो गयी या सच में ही भारत को चीन के हाथों बेच डालने के सपने सरकार ने बुन लिए हैं?
चीन समय पर भारत में 3G तो विकसित कर नहीं पाया तो ऐसे में वह 4G में अपने हाथ क्यों जला रहा है? इसका सीधा सा उत्तर यही है कि इस प्रकार भारत की जासूसी उसके लिए बहुत सरल हो जाएगी| मेरा विश्वास मानिये टेलीकॉम के सहारे किसी भी देश की खुफिया जानकारी निकालना मुश्किल काम नहीं है| इस प्रकार वह 4G में अमरीका को भी टक्कर दे सकेगा|
मुझे समझ नहीं आता कि सारी दुनिया में अपना लोहा मनवा चुके भारतीय इंजीनियरों पर आखिर उनके देश की सरकार ही विश्वास क्यों नहीं करती? अब तक पावर प्लांट अथवा टेलीकॉम के क्षेत्र में हमने जो उपलब्धियां विकसित की हैं, उन्हें आगे नहीं बढ़ाया तो परिस्थितियाँ इतनी अप्रासंगिक हो जाएंगी कि हम इस क्षेत्र में सदा के लिए चीन पर आश्रित हो जाएंगे| यह हमारे लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है| परिस्थितियाँ चिंताजनक हैं व भयंकर भी हो सकती हैं|

Wednesday, December 21, 2011

आओ मनमौनी बाबा, आज तुम्हे थोडा अर्थशास्त्र पढाएं


कौन कहता है कि मनमोहन अर्थशास्त्री है? कौन उनके नाम के आगे "डॉ." की उपाधि लगाता है?
कौन है वह, ज़रा सामने तो आए?
समाज में इस तरह की अफवाहे फैलाने का दंड तो मिलना ही चाहिए|


मनमोहन का अर्थशास्त्र, अभी आपके सामने प्रस्तुत है| मैंने अर्थशास्त्र नहीं पढ़ा है| Economics का "E" भी नहीं जानता| किन्तु अपना हिसाब किताब तो खुद ही कर लेता हूँ| उसके अनुसार ही कुछ गुस्ताखी कर रहा हूँ|


मनमौनी ने अभी रूस यात्रा की| यात्रा का मुख्य कारण था रूस के साथ किया गया एक रक्षा समझौता| जिसके अंतर्गत 20 हज़ार करोड़ की लागत से मनमौनी ने रूस से 42 सुखोई विमान खरीदे हैं| अव्वल तो मुझे इसकी ज़रूरत ही नहीं लगती| मैंने अपनी पिछली पोस्ट में भी लिखा था कि जब भारत अग्नि, पृथ्वी, ब्रह्मोस, त्रिशूल जैसी अत्याधुनिक मिसाइलें बना सकता है तो ये टुच्चे-मुच्चे लड़ाकू विमान उसके लिए कौनसी बड़ी बात है? रक्षा मंत्रालय की ओर से पहले इस दिशा में एक कारण यह दिया गया था कि DRDO (Defense Research & Development Organisation) ने 22 साल की मेहनत से जो अपना खुदका लड़ाकू विमान तैयार किया था उसे भारतीय वायु सेना ने अयोग्य घोषित कर दिया| अत: भारत लड़ाकू विमान बनाने में असक्षम है इस बात को मानते हुए अमरीका, रूस, फ्रांस आदि देशों से भारत रक्षा समझौते कर रहा है|
यह माना जा सकता है कि वह विमान अयोग्य हो, आखिर DRDO का काम कैसे चलता है यह सब जानते हैं| किन्तु क्या यह बात मानने में आती है कि इतनी भारी भरकम मिसाइलें बनाने वाला देश लड़ाकू विमान तक नहीं बना सकता? जिस देश के पास डॉ. कलाम जैसे वैज्ञानिक हों, उनके लिए सुखोई, मिग जैसे विमान क्या हैं?


चलिए एक बार यह भी मान लिया कि सच में भारत देश इस काम के लिए नालायक है| इस कारण विदेशों से ये विमान खरीदने पड़ेंगे| और इसीलिए पहले रूस से 20 हज़ार करोड़ का समझौता हुआ और बाद में फ्रांस से 10 हज़ार करोड़| मतलब कुल 30 हज़ार करोड़|
हमे विदेशों से ये विमान खरीदने हैं, मगर कितने? क्या जितनों की ज़रूरत है उतने खरीदना ज़रूरी है? क्या एक-दो विमान खरीद कर उनकी नक़ल तैयार नहीं की जा सकती? मुझे नहीं लगता कि भारतीय वैज्ञानिक और इंजिनियर इतने नालायक हैं कि नकल भी न कर सकें|
यदि ऐसा किया होता तो 30 हज़ार करोड़ का काम फ़ोकट में हो जाता|


अब ज़रा एक नज़र अर्थशास्त्र पर -


यदि 42 सुखोई न खरीद कर वैसे ही किसी पुराने सुखोई की नक़ल तैयार की जाती तो कितना खर्च आता और उससे क्या-क्या लाभ होते?
इसके लिए मैंने 30 हज़ार करोड़ का एक प्रोजेक्ट बनाया| अब मेरे पास दो विकल्प थे
या तो एक करोड़ लोगों को लेकर 30 हज़ार करोड़ का निवेश किया जाता, जिसमे प्रत्येक के हिस्से में 30 हज़ार रुपये आते| किन्तु यह अधिक कारगर न लगा तो मैंने दूसरा विकल्प सोचा|
यदि 30 हज़ार लोगों को साथ लेकर 30 हज़ार करोड़ खर्च किये जाएं तो प्रत्येक के हिस्से में एक एक करोड़ का निवेश आता है| किसी एक अच्छे वैज्ञानिक को पांच-दस लाख रुपये देकर किसी विमान की नक़ल तैयार कराई जाती| मुझे नहीं लगता कि इस काम में इससे अधिक खर्च आता| बल्कि हमारे बड़े से बड़े वैज्ञानिक यह काम फ़ोकट में ही करने को तैयार हो जाएंगे| बस जो तकनीकी खर्चा आएगा, वह झेलना पड़ेगा|
नक़ल तैयार होने के बाद तो यह काम कुछ भी नहीं रह जाएगा| यकीन मानिए, छोटा-मोटा ही सही किन्तु मैं भी एक इंजिनियर ही हूँ| विमान के आकार-प्रकार और तकनीकी का पता चलने के बाद में उसकी डुप्लीकेट कॉपी बनाना अधिक कठिन नहीं होगा| क्योंकि अब बाकी तो केवल असेम्बलिंग का काम ही बचा न| फिर भी यदि मुझ पर विश्वास न हो तो किसी अच्छे Aeronautical Engineer से संपर्क किया जा सकता है| एक वैज्ञानिक के बाद बाकी बचे 29,999 लोगों में ऐसे केवल 999 Engineers जुगाड़ना भारत सरकार के लिए कोई बड़ी बात नहीं है| इन इंजीनियर्स में कुछ Aeronautical होंगे, कुछ Electronics, कुछ Mechanical, कुछ Electrical, कुछ Metallurgy बस|
चलिए वैज्ञानिक एक नहीं पांच चाहिए तो चार इंजीनियर्स कम किये जा सकते हैं| प्रोजेक्ट 30,000 लोगों से बाहर नहीं जाएगा|
99 बड़े व अनुभवी इंजीनियर्स को 50,000 रुपये मासिक वेतन पर रखा जाए| ध्यान रहे, यह कोई बड़ी बात नहीं है| प्रत्येक के खाते में एक करोड़ रुपये हैं| चूंकि कुल विमानों की संख्या 42 है, इस हिसाब से हमारे पास करीब सवा दो अनुभवी इंजिनियर प्रति विमान के हिसाब से होंगे| जो इन सबके लिए सुपरवाइज़री करेंगे|
करीब दो सौ मध्यम क्रम के इंजीनियर्स को करीब 30-35 हज़ार के मासिक वेतन पर रखा जा सकता है| इस श्रेणी के हमारे पास करीब पांच इंजिनियर प्रति विमान के हिसाब से होंगे जो विमानों के किन्ही मुख्य हिस्सों पर ध्यान देंगे|
फिर निम्न वर्ग के 700 नए इंजीनियर्स को करीब 25,000 रुपये के मासिक वेतन पर रखा जा सकता है| इनकी उपलब्धता हमारे पास करीब 17 इंजीनियर्स प्रति विमान होगी| जो विमान के एक, दो या तीन भागों का काम सम्भालेंगे|
इंजीनियर्स के बाद करीब 5000 या इससे अधिक Technicians को करीब 15,000 के मासिक वेतन पर रख करीब 120 या अधिक Technicians प्रति विमान पर काम लिया जा सकता है, जो विमान का बाकी तकनीकी काम संभाल सकते हैं|
सबसे अंत में करीब 23,000-24,000 हज़ार अन्य छोटे-मोटे कर्मचारियों को करीब 10,000 रुपये के मासिक वेतन पर रख लिया जाए, जिससे कि हमारे पास करीब 570 अन्य कर्मचारी प्रति विमान उपलब्ध हों|
कुछ लोगों को शंका हो सकती है कि यह काम आखिर कितने दिन चलेगा| मैं कहता हूँ कि पूरा जीवन चलता रहेगा| याद रहे, प्रत्येक व्यक्ति के खाते में एक करोड़ रुपये हैं| सबसे अधिक वेतन पाने वाले इंजीनियर्स को 50,000 मासिक मिल रहा है| इस हिसाब से वह करीब 16-17 वर्षों तक यह काम कर सकता है| ठीक है, जब वेतन बढाने की बारी आए तब भी कोई चिंता नहीं| 30 हज़ार करोड़ का ब्याज इतना होगा कि ये Money Rotation जीवन भर चलता रहेगा| ये इतना धन है कि विमान को बनाने के लिए लगने वाले Raw Materials का खर्चा भी निकल सकता है| शायद थोडा बहुत ऊपर से लगाना पड़ जाए| इसमें कोई बड़ी बात नहीं है| विदेशों में इतने रुपये फूंकने से यह कहीं बेहतर है| अमरीका, रूस, फ्रांस आदि देश इसे अपने खर्चे के हिसाब से मुनाफा कमा कर बेचते हैं| हमारा माल व मजदूरी उनसे कहीं अधिक सस्ते हैं| इन देशों में मिलने वाला माल व मजदूरी हम भारतीयों के लिए कम से कम दस गुना महंगे हैं|
शायद कुछ लोगों को इस प्रकार तैयार विमानों की गुणवत्ता पर शंका हो| कोई बात नहीं इस शंका को दूर करने के लिए दो उपाय किये जा सकते हैं| एक तो इस प्रोजेक्ट में किसी भी प्रकार के आरक्षण की कोई संभावना न रखी जाए, जिससे की बेहतरीन वैज्ञानिक व इंजीनियर्स यह काम सम्भालें न की भीख में नौकरी पाने वाले, आरक्षण के द्वारा गुणी लोगों का हक़ मारने वाली जमात| दूसरा उपाय, एक से डेढ़ लाख रूपये मासिक पाने वाले बीस-पचास अति अनुभवशाली इंजीनियर्स को और रखा जा सकता है| चिंता न कीजिये, धन बहुत है| इसकी कोई कमी भारत देश में नहीं है|


आंकड़ों में थोड़ी बहुत ऊंच-नीच हो सकती है, मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ| कोई अच्छा अर्थशास्त्री इसमें संशोधन कर सकता है|


अब बताइये कि 30,000 करोड़ के इस रक्षा समझौते में किसी को क्या फायदा हुआ? सारा फायदा विदेशों को और हमारे खाते में केवल नुकसान| यदि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री अपना थोडा सा अर्थशास्त्र उपयोग में ले सकें तो 30,000 लोगों को रोज़गार भी मिल जाएगा|


ध्यान रहे चीनी ऐसा कर चुके हैं| साल 2009 में इंधन ख़त्म होने की वजह से एक अमरीकी विमान को चीन में उतारना पडा था| आधिकारिक रूप से इस विमान को मुक्त करने में चीन ने दस दिन लगा दिए और इन दस दिनों में चीन ने इस विमान की पूरी जन्मकुंडली बनाकर वैसे पचासों विमान खड़े कर दिए|
जब चीन यह काम कर सकता है तो मात्र 400 करोड़ की लागत से "चंद्रयान" बनाने वाले दिग्गज भारतीयों के लिए यह कौन सी बड़ी बात है?
अभी तो 400 करोड़ में एक विमान खरीद रहे हैं, जबकि हम भारतीय 400 करोड़ में चंद्रयान जैसा उपगृह बना चुके हैं, जिसे देख अमरीकी आँखें भी फटी रह गयीं थीं|
मुझे तो लगता है कि भारत देश को एक अत्याधुनिक लड़ाकू विमान खडा करने में अधिक से अधिक चालीस-पचास करोड़ का खर्चा आएगा या शायद उससे भी कम|


और यही अर्थशास्त्र यदि अन्य दिशाओं में भी लगाया जाए तो भारत हर वो निर्माण करने में सक्षम है, जिसकी इस समय दुनिया को आवश्यकता है| हमे तो नक़ल करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है| भारत सब कुछ खुद करने में ही सक्षम है| फिर न हमे रक्षा समझौतों की ज़रूरत होगी, न वाल मार्ट की और न ही अन्य विदेशी समानों की जो हमारे घरों तक पर अपना कब्ज़ा जमा चुके हैं|
सोचिये ज़रा, यदि इन सब विदेशी वस्तुओं का भी बहिष्कार हम भारतीय कर दें तो अपनी अर्थव्यवस्था व निर्माण से कितने ही भारतीयों को अच्छा ख़ासा रोज़गार मिल सकता है|
जब केवल लड़ाकू विमान बनाने में ही 30,000 भारतीयों को काम मिल रहा है तो सभी क्षेत्रों में स्वावलंबी होने पर कितने ही भारतीयों को रोज़गार मिलेगा| शायद काम इतना बढ़ जाएगा कि लोग कम पड़ जाएंगे| भारत देश में कोई भी बेरोजगार नहीं होगा|

नोट : आज भी हम भारतीय यह मानते हैं कि 17 दिसंबर 1903 में राईट बंधुओं ने पहला विमान बना कर अमरीका के दक्षिण कैरोलीना के समुद्री तटों पर उड़ाया जो 120 फुट की ऊंचाई तक उड़ने के बाद नीचे गिर गया था| जबकि इससे आठ वर्ष पहले एक मराठी श्री शिवकर बापूजी तलपडे ने सन 1895 में मुंबई के चौपाटी के समुद्री तट पर एक विमान बना कर उड़ाया था जो 1400 फुट की ऊंचाई तक उड़ा और सुरक्षित नीचे उतार लिया गया| मज़े की बात इसमें कोई भी चालक नहीं था| इस महान वैज्ञानिक ने इसे ज़मीन से ही नियंत्रित कर उड़ाया था| उससे भी अधिक मज़े की बात यह है कि इसकी प्रेरणा उन्होंने महर्षि भारद्वाज के विमानशास्त्र से ली जो भारद्वाज मुनि कई हज़ार साल पहले लिख चुके हैं| बाद में अंग्रेजों ने झांसा देकर उनसे इस विमान का डिजाइन हथिया लिया| इस घटना के कुछ ही समय पश्चात श्री शिवकर बापूजी तलपडे की रहस्यमय तरीके से मौत हो गयी| किन्तु मैकॉले मानस पुत्र इस सच्चाई को आज तक हमारे पाठ्यक्रमों में शामिल नहीं कर पाए| जबकि आज तक राईट बंधुओं का गुणगान गाए जा रहे हैं|

Sunday, December 18, 2011

Come on HINDUS, Lets Enjoy...CHEERS

आओ हिन्दुओं जश्न मनाएं| इससे ज्यादा हम कर भी क्या सकते हैं?
देखिये अभी हफ्ते बाद क्रिसमस आने वाला है| पता नहीं कितने ही मुर्ख बधाइयां देने आएँगे| फिर हफ्ते बाद नया(?) साल| इस बार मूर्खों की तादात और भी बढ़ जाएगी| शाम को मैक डोनाल्ड, पिज्जा हट, रात भर डिस्को-पार्टी, मस्ती, बीयर, सिगरेट, बाइक्स, रॉक म्यूजिक के साथ साथ HAPPY NEW YEAR का उद्घोष, और भी पता नहीं क्या क्या...
अंग्रेजों ने आधी दुनिया पर राज किया था, किन्तु गुलामी का सबसे ज्यादा असर हम भारतीयों पर ही हुआ है| अंग्रेज़ बनने की होड़ मची है| अँगरेज़ तो सोच रहे होंगे की फालतू ही दो सौ सालों तक अपने घर से दूर झक मारी| यदि मैकॉले पहले ही पैदा हो गया होता तो अंग्रेज़ इंग्लैण्ड में बैठकर ही हिन्दुस्तान चलाते|

हमारे आदरणीय(?), पूजनीय(?), सम्मानीय(?) प्रधानमन्त्री श्री(?) श्री(?)......100000000......8 मनमौनी सिंह का रूस दौरा हुआ| क्यों हुआ वो बाद में|
पहले तो उनके रूसी दौरे के दो दिन बाद ही इस्कॉन के संस्थापक "ए सी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद" द्वारा रचित "भगवत गीता एज इट इज" को रूस में प्रतिबंधित कर देने की तैयारी हो रही है| कल सोमवार तक अदालत का अंतिम निर्णय भी आ जाएगा| रूसियों का देश है, वो चाहे जो कर सकते हैं| किन्तु उनका यह कहना कि "गीता एक उग्रवाद को बढ़ावा देने वाली किताब है जिससे केवल कलह-कलेश फैलता है", अनुचित है और सहन करने लायक नहीं है| उसपर मनमौनी का यह कहना कि हम रूस के इस फैसले की कड़ी निंदा करते हैं, आग में घासलेट डालने का काम करता है| उनसे इससे अधिक अब कोई अपेक्षा भी नहीं रह गयी| निंदा ही करनी है तो वह तो मैं भी कर सकता हूँ, फिर मुझे ही प्रधानमंत्री बना दो| शायद निंदा से ऊपर उठकर कुछ तो कर ही लेंगे|
खैर यहाँ किसी को खबर नहीं है| इस साल के जून से ही रूस में भगवत गीता पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए कार्यवाही चल रही है| मॉस्को के 15000 हिन्दुओं व कई इस्कॉन अनुयायियों ने भारत के प्रधानमंत्री की रूस यात्रा को देखते हुए उनसे गुहार लगाईं थी कि वे गीता पर प्रतिबन्ध को रोकने के लिए कोई कूटनीतिक प्रयास करें| अब क्या कूटनीतिक प्रयास हो सकते थे वो भी बाद में|
पहले तो ये कि जब पिछले साल अमरीका के एक पादरी फादर जॉन्स ने 9/11 को "कुरआन बर्न डे" ही कह दिया था, तब दुनिया के सभी सत्तर इस्लामी मुल्कों में आग लग गयी थी| बारिश कहीं हो रही थी और छतरियां कहीं और खुल गयी थी| खैर ये भी उन मुल्कों का एक सकारात्मक कदम था| कम से कम अपने धर्म ग्रंथों के अपमान को सहन तो नहीं करते|
हिन्दुओं के वश में ऐसा कुछ नहीं है| कुछ हिन्दू तो ये स्यापा पा रहे हैं कि रूसियों का देश है, वे जो चाहे कर सकते हैं| हम क्यों चिंता करें? कुछ का तो यह भी कहना है कि जब 85 प्रतिशत हिन्दू गीता पढना तो दूर उसे खरीदते तक नहीं हैं तो हम क्यों चिंता करें गीता की|
कम से कम ऐसे ठन्डे (सेक्युलर और शांतिप्रिय) हिन्दुओं को तो गीता अवश्य ही पढनी चाहिए| यदि गीता पढी होती तो गीता के इस अपमान पर महाभारत अवश्य हो जाता|

खैर इन मूर्खों पर ध्यान देने से अच्छा है, पहले ये जाने कि मनमौनी का रूस दौरा क्यों हुआ था?
दरअसल मनमोहन सिंह ने रूस के साथ एक रक्षा समझौता किया था| जिसके लिए वे रूस से 20 हज़ार करोड़ की लागत से 42 सुखोई विमान खरीदने गए थे| रूस की अर्थव्यवस्था भारत जैसे देशों को अपने हथियार बेचने से चलती है| चाहे जंगी जहाज गोबोंचोव हो या मिग और सुखोई जैसे विमान| अमरीका और रूस जैसे देशों का धंधा ही यह है| यहीं से मनमोहन कुछ कूटनीतिक प्रयास कर सकते थे, जिनकी चर्चा ऊपर की गयी है| इस रक्षा समझौते के चलते अपने नाक, आँख, कान, हाथ, टांग सब ऊपर रखे जा सकते थे| किन्तु मनमौनी के लिए इतनी दलेरी संभव नहीं|
अब कुछों के मन में प्रश्न आ सकता है कि ये विमान रूस से नहीं खरीदते तो कहाँ से आते? किसी से लेने की कोई ज़रूरत ही नहीं है| एक ओर तो भारतीय वैज्ञानिक अग्नि, पृथ्वी, ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें बना लेते हैं, वहीँ दूसरी ओर टुच्चे टुच्चे विमान व जहाज बनाने में भारत असक्षम है| क्या ये बात मानने में आती है? चलो यह भी मान लिया कि ये सब भारत में नहीं बन सकता, तो भी 42 विमान खरीदने की क्या ज़रूरत है? एक खरीदो और बाकी 41 क्या 4100 उसकी देखा देखा बना लो| भाई नक़ल तो कर सकते हैं, अब इतना गया गुज़रा देश भी नहीं है हमारा| 2009 में जब एक अमरीकी लड़ाकू विमान को इंधन ख़त्म होने के कारण चीन में उतारना पडा तो आधिकारिक रूप से उसे छोड़ने के लिए चीन ने दस दिन लगा दिए| इन दस दिनों में चीन ने उस विमान की सारी जन्म कुंडली बना कर वैसे पचासों विमान खड़े कर दिए| जब चून्धी आँखों वाले चार फुटिए ऐसा कर सकते हैं तो हम तो उनसे कहीं बेहतर हैं न|

दूसरी घटना पाकिस्तान से आए 151 हिन्दुओं की है, जो भारत में ही यहाँ-वहां भटक रहे हैं| इन शरणार्थियों के लिए अब भारत में ही कोई जगह नहीं बची है| ये पाकिस्तान दुबारा जाना नहीं चाहते| क्योंकि वहां न केवल इनकी जान को खतरा है, बल्कि इनकी बहन-बेटियों की इज्ज़त भी खतरे में है| कईयों ने अपने स्वजनों व इज्ज़त को खोया है| किन्तु भारत में बांग्लादेश से आए 5-6 करोड़ मुसलमान शरणार्थियों के लिए तो जगह है किन्तु इन 151 हिन्दुओं के लिए नहीं| कभी दिल्ली में बैठी सरकार इन्हें भगा देती है तो कभी उत्तर प्रदेश की माया इन्हें नोएडा से फटकार कर निकाल देती है| कल शाम को उत्तर प्रदेश पुलिस ने नोएडा के एक मंदिर में शरणार्थी इन हिन्दुओं को जबरन बाहर निकाल कर एक हाइवे पर छोड़ दिया| कड़कती सर्दी में इनका क्या होगा, इसकी चिंता किसी को नहीं है| बांग्लादेशी मुसलामानों को तो सरकार राशन कार्ड व वोटर आई डी कार्ड देना चाहती है, जबकि इन हिन्दुओं के लिए सर छुपाने की जगह तक नहीं|

अंत में जाते-जाते एक अनुरोध - कृपया कोई हिन्दू मुझे MERRY CHRISTMAS अथवा HAPPY NEW YEAR जैसे शब्द न कहें| अन्यथा औपचारिकता के लिए SAME TO YOU भी नहीं कह सकूँगा|

Thursday, November 17, 2011

सी.बी.आई. को चिदंबरम की खुली धमकियां| जियो डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी...

कांग्रेस की संगत का असर देश की प्रमुख जांच एजेंसी सी.बी.आई. पर साफ़ दिखाई दे रहा है| यहाँ तक कि हरामखोरी भी सीख डाली| खैर गुरु चेले की लड़ाई में गुरु अपने पास एक न एक ऐसा गुप्त हथियार तो रखता ही है जिससे कि कभी चेला गुरु के सामने सर उठाने की कोशिश करे तो उसका सर कुचला जा सके|


जैसा कि हम सब जानते ही हैं कि राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला व 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, सभी में डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने सरकार का जीना हराम कर रखा है| यहाँ तक कि देश कि सर्वोच्च जांच एजेंसी सी.बी.आई. की नाक में भी नकेल कस रखी है| सी.बी.आई से वही काम करवा रहे हैं जो यह एजेंसी करना ही नहीं चाहती| जब सुप्रीम कोर्ट का हथोडा सर पर पड़ेगा तो कोई क्या करेगा?

करीब दो सप्ताह पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने सी.बी.आई. को यह आदेश दे दिया था कि वह तीन दिन के अन्दर 2G घोटाले में चिदंबरम का नाम आने सम्बन्धी सभी फाइलें डॉ. स्वामी को सौंप दे| बारह दिन निकलने के बाद भी जब डॉ. स्वामी को वे फाइलें नहीं मिलीं तो उन्होंने फिर से विशेष अदालत के जज श्री ओ.पी.सैनी से इससे सम्बंधित पूछताछ की| ऐसे में स्पेशल कोर्ट ने सी.बी.आई. को जम कर लताड़ा| जैसा कि आजकल सरकार भी ऐसी नित नयी फटकारें सुप्रीम कोर्ट द्वारा खाती ही रहती है| सी.बी.आई. पर कांग्रेस की संगत का सबसे बुरा असर यही हुआ है|
फटकार पड़ने के बाद सी.बी.आई. के वकील ए.के.सिंह ने १७ नवम्बर तक सभी सम्बंधित फाइलें डॉ. स्वामी को सौंपने का आश्वासन सुप्रीम कोर्ट को दे दिया है|

2G घोटाले के चलते डॉ. स्वामी की कृपा से पहले ही अच्छी खासी शख्सीयतें तिहाड़ वास कर ही रही हैं, साथ ही स्मरण रहे कि डॉ. स्वामी यह भी कह चुके हैं कि एक बार सभी फाइलें उनके हाथ लगते ही पंद्रह दिन के भीतर चिदंबरम भी तिहाड़ दर्शन कर लेगा| अब ऐसे समय में सी.बी.आई. के पाले में गेंद को देखकर उसे चुप रखना चिदंबरम की सबसे बड़ी मजबूरी थी|
अभी कुछ दिन पहले ही अहमदाबाद में हुए एक कार्यक्रम में जनता को संबोधित करते समय डॉ. स्वामी ने कहा कि सी.बी.आई. का वर्तमान निदेशक उनका शिष्य रह चूका है, जिसने उन्हें बताया था कि चिदंबरम ने सी.बी.आई. को खुली धमकी दी है कि 2G घोटाले में उससे सम्बंधित कोई भी फ़ाइल यदि डॉ. स्वामी तक पहुंची तो वह सम्बंधित अधिकारियों की सीआर खराब कर देगा|
अब यह तो कभी बताने की जरुरत ही नहीं कि सी.बी.आई. गृह मंत्रालय के अधीन है| साथ ही यह भी बताने की जरुरत नहीं कि चिदंबरम अथवा कांग्रेस सी.बी,आई, का आखिर क्या बिगाड़ लेंगे?
किसी भी आई.पी.एस. अधिकारी की सीआर खराब हो जाने से उसका पूरा करियर चौपट हो सकता है| इसके अच्छे खासे उदाहरण सी.बी.आई. के पूर्व संयुक्त निदेशक श्री यू.एन.विश्वास हैं, जिन्होंने चारा घोटाले सम्बंधित कड़ी जांच में कांग्रेस तक कि चूलें हिला दी थीं| अब इसका दंड तो उन्हें मिलना ही चाहिए, आखिर कांग्रेस से जो पंगा ले लिया| अत: जांच पूरी होने के बाद उनके अगले प्रोमोशन को रोक दिया गया व साथ ही सीनियर होने के बावजूद उन्हें सी.बी.आई. के निदेशक के पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया| इतने से भी पेट नहीं भरा तो ऐसी परिस्थितियाँ खड़ी कर दीं कि श्री विश्वास अपनी पेंशन पाने के लिए अंत तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते रहे| इतना ही नहीं चारा घोटाले में जांच सम्बन्धी अन्य आई.ए.एस. अधिकारियों के भी प्रोमोशन रोक दिए गए|
इसी प्रकार याद होगा जब देश की पहली महिला आई.पी.एस. अधिकारी किरण बेदी के साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया गया था| राजिव गांधी का चालान काटने व इंदिरा गांधी की गाडी नो पार्किंग से उठाने का दंड उन्हें कभी तिहाड़ जेल में पोस्टिंग के रूप में मिला तो कभी उनको छोड़कर उनसे दो वर्ष जूनियर ऑफिसर को दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनाकर मिला|

खैर ये सब तो कांग्रेसी तानाशाही की दास्तानें हैं, अधिकतर तो जानते ही हैं|
मुख्य बात ये है कि डॉ. स्वामी के दावों के कारण चिदंबरम व सोनिया के हलक से पानी भी नहीं उतर रहा| डॉ. स्वामी का दावा है कि 2G घोटाले में चिदंबरम ने करीब दस हज़ार करोड़ रुपये की दलाली खाई है| डॉ. स्वामी का यह भी कहना है कि तात्कालिक वित्तमंत्री व वर्तमान गृहमंत्री के अनुमोदन व हस्ताक्षर से युक्त दस्तावेज स्पेक्ट्रम घोटाले में उनकी मिलीभगत साबित करते हैं। सोनिया को यह डर है कि यदि चिदंबरम पकड़ा गया तो उसके पचास हज़ार करोड़ का भांडा भी फूटा ही समझो|

डॉ. स्वामी न होते तो पता नहीं कौन कांग्रेस की काली करतूतों का पर्दाफाश करता व कौन भाजपा के लिए सत्ता के गलियारों तक पहुँचने का रास्ता साफ़ करता? खैर अभी भी भाजपा सजग हो जाए तो उसे वह गौरवपूर्ण स्थान मिल सकता है जिसकी वह अधिकारी है|

अंत में जाते-जाते एक खबर यह भी है कि कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी ने अपने भाषण में उत्तर प्रदेश के युवाओं को भिखारी कहा है| मुझे तो लगता है कि अब इसके खुद के भिखमंगे बनने के दिन आने वाले हैं|